मूल्य शिक्षा
कुबेर सिंह गुरूपंच1, नागेश्वर प्रसाद साहू2
1प्राचार्य, एम. जे. महाविद्यालय, भिलाई (छ.ग.)
2छात्रशिक्षक (बी.एड.), एम. जे. महाविद्यालय, भिलाई (छ.ग.)
प्रस्तावना
एक ओर बच्चों को महंगे से महंगे व प्रतिष्ठित, सभी सुविधाओं से भरपूर स्कूलों में भेजने की होड़ है, तो दूसरी ओर ऊंची आय व नौकरी का मार्ग प्रशस्त करने वाली कोचिंग क्लासों में भीड़ लगी हुई है। इन सब सरगर्मियों में नैतिक मूल्यों की बात कहीं दब-सी गई है।यदि कोई भूले-बिसरे नैतिक मूल्यों की शिक्षा की बात कर भी देता है, तो ऐसा रिसपांस मिलता है जैसे कोई बहुत पुरानी सी आउटडेटिड बात कह दी हो या फिर इसे धार्मिक शिक्षा के साथ गड़मड़ कर दिया जाता है। पर यहां हमारा तात्पर्य दूर-दूर तक किसी एक धर्म की शिक्षा से नहीं है। कुछ ऐसे शाश्वत नैतिक मूल्य हैं जो सभी धर्मों को मान्य होते हैं और जो कभी पुराने नहीं पड़ते हैं, सदा किसी स्वस्थ व ईमानदार समाज के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। क्या ऐसे नैतिक मूल्यों को शिक्षा में महत्वपूर्ण स्थान नहीं मिलना चाहिए? उदाहरण के लिए इन चंद नैतिक मूल्यों पर विचार करें। ईमानदारी व मेहनत की कमाई ही सबसे श्रेष्ठ है, बेईमानी व भ्रष्टाचार से सदा दूर रहना चाहिए। धर्म, जाति, नस्ल, रंग आदि के आधार पर कभी भेदभाव नहीं करना चाहिए व सब मनुष्यों को एक समान मानना चाहिए। अपने से कमजोर व निर्धन व्यक्तियों के प्रति सहायता व सहयोग की भावना रखनी चाहिए। सभी पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं के प्रति करूणा की भावना मनुष्य में होनी चाहिए। अन्याय से किसी का हक नहीं छीनना चाहिए। अपने हितों की रक्षा के साथ दूसरों के हितों, अधिकारों व दृष्टिकोण का भी ख्याल रखना चाहिए। दुनिया में शांति, अहिंसा, सहनशीलता, भाई चारे का संदेश फैलना चाहिए। पेड़-पौधों, हरियाली, पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए है।1
मूल्य का अर्थ:-
इसमें शक की कोई गुंजाईश नहीं है कि इक्कीसवीं सदी में मूल्य आधारित शिक्षा की बेहद आवश्यकता है , क्योंकि वर्तमान समय मूल्यों की स्थापना का समय नहीं रहा बल्कि यह समय मूल्य विघटन का समय है ।ऐसे समय उम्मीद की एक किरण नजर आती है ,वह है मूल्य आधारित शिक्षा प्रदान करना ।2 आज चारों ओर अविश्वास का ,बेईमानी का, माहौल बना हुआ है, इसके परिणामस्वरूप सकारात्मक के बजाय नकारात्मक सोच निर्मित हों रही है । ऐसे बिगड़े हुए माहौल को सवारने के लिए शिक्षा का साथ ही कारगर साधन है । मूल्यों पर आधारित शिक्षा प्रदान करने से ही भावी नागरिक तैयार होंगे ,उनकी सोच में बदलाव आएगा । शिक्षा के तीन उद्देश्य होने चाहिए। वह लोगों को अपने देश के गौरवपूर्ण अतीत के बारे में बताए। वह उन्हें पूर्वाग्रहों और विभाजनकारी शक्तियों से दूर करे और उनके जीवन को एक सही दिशा दे। मनोविज्ञान के अनुसार मनुष्य का दिमाग दो हिस्सों यानी दाएं और बाएं में बंटा होता है। दाएं हिस्से में सृजनशीलता, आत्मज्ञान, कल्पना, विश्वास, प्यार, सहानुभूति और सहनशीलता जैसे भावनात्मक गुणों का वास होता है। बायां हिस्सा तर्क, निर्णय और पड़ताल जैसे विचारों को नियंत्रित करता है। शिक्षा भी ऐसी ही होनी चाहिए जो मनुष्य के व्यक्तित्व में इन दोनों हिस्सों का विकास करे।
शिक्षा लोगों के ज्ञान और कौशल को विकसित करने की एक प्रक्रिया है। यह ज्ञान और कौशल उसके जीवन में लागू होता है। इस बात पर भी ध्यान देना जरूरी है कि शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य ज्ञान प्राप्ति और तकनीकी दक्षता नहीं हो। हालांकि आज के जमाने में ये सब चीजें भी बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। लेकिन असल में शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो छात्रों में ऐसी समझ और तार्किक शक्ति विकसित करे जो उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक बना सके।3
मूल्य की आवश्यकता:-
शिक्षा देने का काम शिक्षक का है और एक सच्चे शिक्षक के लिए अध्यापन तकनीक नहीं, वह उसकी जीवनपद्धति है। क्या हमने कभी उन कारणों को तलाशने की कोशिश की है जिनके कारण शिक्षा मूलभूत शैक्षिक मूल्यों की अपेक्षा से दूर होती जा रही है ? निश्चित रूप से हमने बहुत सी पुस्तकें पढ़ी हैं, उन सूचनाओं को याद भी कर लिया है, परीक्षाएं भी पास कर ली हैं, हमारे पास बहुत सारी उपाधियां भी हैं और इन उपाधियों ने हमें जीविका के साधन भी उपलब्ध करा दिए हैं। इसका अर्थ है यदि शिक्षा रोजगार के लिए थी, तो हम निश्चित रूप से सफल हुए हैं। पर यह भी उतना ही सच है कि आज हम मशीन तो हुए हैं पर मनुष्यता कहीं बहुत पीछे छूट गई है। हमारी संवेदना दिन-प्रतिदिन मरती जा रही है। हमारे पास भौतिक समृद्धि तो अपार है पर हमारी संस्कृति, हमारे मूल्य, हमारे आपसी सम्बन्ध, हमारी जड़ें खोखली होती जा रही हैं और आज का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है।
धर्म एवं दर्शन:-
जीवन जीने के लिए कौन सा तरीका अपनाना चाहिए। हर धर्म और संप्रदाय में इस बारे में विस्तार से व्यवस्था की गई है। हर धर्म का अपना एक दर्शन होता है, जो बताता है कि सत्य के नजदीक किस तरह पहुंचा जा सकता है। कई लोग इस सत्य का मतलब नहीं समझ पाते। इस स्थिति में वे अपने धर्म को कट्टरता और अतिवाद का पर्याय बना देते हैं। आज लोग धर्म की असली शिक्षा से दूर होते जा रहे हैं। यही वजह है कि समाज में अराजकता फैलती जा रही है। हिंदू धर्म केवल एक विश्वास नहीं है। यह कारण और आत्मज्ञान का सम्मिलित स्वरूप है, जो पारिभाषित तो नहीं किया जा सकता, लेकिन अनुभव किया जा सकता है। पूरे विश्व में केवल हिंदुत्व ही एकमात्र धर्म है जो मानव मस्तिष्क की पूर्ण स्वतंत्रता की बात करता है। हिंदुत्व ही आजादी है। विशेष तौर पर भगवान के बारे में विचारने की आजादी! पवित्रता किसी के शरीर या वस्तु से नहीं बल्कि हमारे नजरिए में होती है। यानी किसी भी व्यक्ति या वस्तु विशेष को हम किस नजरिए से देख रहे हैं, उस दृष्टि में ही पवित्रता का वास है। असली मनुष्य वही है जो भूखे को खाना खिलाए, बीमार की सेवा करे और पापी को माफ कर दे। दर्शन सिखाता है कि हमें अपना जीवन किस तरह जीना चाहिए। किसी सच्चे दार्शनिक और चिंतक को अतीत का विश्लेषण करने और उससे जुड़े रहने के साथ ही भविष्य की ओर भी नजरें गड़ाए रखनी चाहिए।
शिक्षा वही जो जीवन-मूल्य बन जाए:-
प्रोजेक्ट ग्रीनहैंड्स (पीजीएच) पर्यावरण की साज-संभाल से जुड़ा एक प्रोजेक्ट है, जिसमें स्थानीय समुदाय सक्रिय रूप से भाग ले रहा है। इसके तहत स्थानीय लोग नन्हे पौधों को रोप कर तब तक उनकी देखभाल करते हैं, जब तक वे पौधे इतने बड़े नहीं हो जाते कि वो अपने दम पर जीवित रह सकें। इस तरह वे देश भर में तेजी से चल रही जंगल-कटाई की भरपाई करने में मदद कर रहे हैं। कुछ ईशा विद्या स्कूलों में पीजीएच नर्सरियां हैं, जहां विद्यार्थी नन्हे बीजांकुरित पौधों को रोपते हैं जो उनके पर्यावरण अध्ययन के पाठ्यक्रम का ही हिस्सा है। उनको कक्षा का यह प्रायोगिक पहलू बड़ा अच्छा लगता है, खास तौर से जब वे बीजों को अंकुरित हो कर नन्हे पौधों की तरह बढ़ते हुए देखते हैं। स्कूल के अधिकारी, समुदाय के लोगों तक जाते हैं और उनको प्रोत्साहित करते हैं कि वे तीज-त्योहारों के मौकों पर दोस्तों, रिश्तेदारों और सहकर्मियों को नन्हे पौधे भेंट में दें। स्कूल स्टाफ और विद्यार्थी अपनी मिली-जुली कोशिशों और जागरूकता अभियानों के जरिए स्कूल क्लबों, फोरम्स, और समुदाय-समूहों को 3,000 पौधे मामूली दामों पर बेचने में सफल हो पाए। सुश्री पुष्पा ने सुबह की असेंबली के वक्त छात्रों को यह खुशखबरी दी और उन्हें उनके जोश और उत्साह के लिए बधाई दी। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि सिर्फ 845 पौधे ही बिकने से रह गए हैं।4
उपसंहार:-
विविध विद्वान मूल्य शब्द का संबंध दर्शन, मनोविज्ञान, सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीति आदि के साथ जोड़ते है। मूल्य शब्द का प्रयोग मूल्य की आवश्यकता, प्रेरणा, आदर्श, अनुशासन आदि अनेक कार्यों में होता है। जीवन को आदर्श तथा सफल बनाने में मूल्य सहायक होता है । मानव का विवेकपूर्ण व् नम्र व्यवहार उसे मूल्यवान बनाता है । आज समाज में मूल्य संक्रमण की स्थिति उत्पन्न हो गई है । मानव पुराने मूल्यों को पूरी तरह से नकार नहीं पा रहा तथा नए मूल्यों को सहर्ष ही स्वीकार करना नहीं चाहता। यदि हम चरित्र और व्यक्तित्व को स्थान ही नहीं देते, तो प्रत्येक स्तर पर हमें इतने चरित्रों के अध्ययन की क्या आवश्यकता थी? किसी भी परिस्थिति में हमारा दृष्टिकोण और निर्णय बहुत मायने रखते हैं। शिक्षा जीवन को दिशा देने के लिए होती है, उसे भटकाव में छोड़ने के लिए नहीं।5
शिक्षाविदों के पास रोचक ढंग से छात्रों तक अध्ययन सामग्री व प्रेरक संदेश पहुंचाने के ढेरों तौर-तरीके हैं, पर मूल बात यही है कि क्या मौजूदा व्यवस्था शिक्षा में इन नैतिक मूल्यों को समुचित महत्व देने को तैयार है? तर्कसंगत बात तो यह है कि यदि नैतिक शिक्षा ठीक से दी जाए तो यह शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। पर आज जब धन-अर्जन की क्षमता हासिल करने को सर्वाधिक महत्व दिया जा रहा है, इन नैतिक मूल्यों को शिक्षा में कितना महत्व मिल पाएगा यह सवाल हमारे सामने हैं।
संदर्भरू
1ण् क्मेीइंदकीनए 14ए डंतए 2011ए डवदकंल
2ण् क्तण् व्उचतंांेी ैंतउंए बेहद जरूरी है शिक्षा में नैतिक मूल्यों का होना,ीजजचरूध्ध्ूूूण्इींेांतण्बवउध्उंींतंेीजतंध्चनदमध्बपजल.इसवहहमतध् इसवहध्100354ण्
3ण् नवभारत टाइम्स, ैमच 5ए 2008
4ण् ।दंदक स्ंींतए छवअण् 18
5ण् डाॅ. वीणा शर्मा, अध्यापक, शिक्षा और मूल्य बोध, ीजजचरूध्ध्पितेजदमूेसपअमण्बवउध्बंतममतध्473.मकनअंसनमेण्ीजउस
ग्रंथ सूचीरू.
· Dr. Muhammad Suleman, Ucchtar Shiksha Manovigyan Advance Educational Psychology, Motilal Banarsidass Publishers.
· Jasta Hariram, Aadhunik Bharat Mein Shaikshik Chintan, Kitabghar Prakashan.
· Rai, Amar Nath, Modern Counselling Psychology, Motilal Banarsidass Publishers.
Received on 15.03.2014
Revised on 05.04.2014
Accepted on 09.04.2014
© A&V Publication all right reserved
Research J. Humanities and Social Sciences. 5(3): July-September, 2014, 347-349